दास्ताँ ऐ जायका

(seems so like my story…)
 

मुझे खाना बनाना पसंद है। वैसे सही कहा जाये तो खाना बनाना नहीं वरन खाना बनाते हुए प्रयोग करना पसंद है। एक दिन कहीं पढ़ा कि सब्जी में पड़ने वाले मसाले प्राकृतिक होने के कारण उन्हें पकाना नहीं चाहिए, सिर्फ ऊपर से डालना चाहिए। उस रात बनी सब्जी कूड़ेदान में दो दिन तक सड़ती रही। एक दिन गरम दूध में केले डाल दिए तो दूध फट गया। कभी दही, कभी नींबू, कभी अचार मसाला डाल कर सब्जी को ख़राब किया। अनुसंधान के नाम पर कई बार खाने में तला लगा।

बारिश के मौसम में चाय-पकोड़े खाने के लालच में पकोड़े तेल में जलाकर काले किये और लेमन टी बनाने के चक्कर में फटे दूध की चाय बनाई। दीवाली में पटाखे तो सभी फोड़ते हैं मगर मैंने तेल भरी कढ़ाई में समोसे फोड़े। दक्षिण भारतीय पाक शैली से प्रभावित हो एक रविवार डोसा मसाला पावडर खरीदा तो पूरी छुट्टी उस तवे को साफ़ करने में निकली, भूखे पेट रहे सो अलग। कभी ज्यादा पानी से चावल की खीर बन गयी तो कभी कम पानी की वजह से कुकर फटते – फटते बचा। ऑस्ट्रेलिया के मानचित्र का चिंतन करते हुए बनाई गयी रोटी अफ्रीका का अनुसरण करने लगी। कच्चे पपीते की सब्जी खाने के बाद एक हफ्ते पेट दर्द रहा। मगर हम भी हार मानने वालों में से कहाँ थे!

तय हुआ कि टीवी पर "कुकरी शो" देखे जाएँ। क्या पता चौपिंग पैड पर सर रगड़कर अपनी जड़मति भी सुजान हो जाए? मगर आजकल टीवी पर कुकरी कम और खुखरी शो ज्यादा लोकप्रिय हैं। जैसे तैसे संजीव कपूर के शो खाना खज़ाना को ढूँढा गया। एक पल के लिए लगा कि खाना बनाना कितना आसान है।

देखिये कितने सुन्दर चाइना की तश्तरियों में सलीके से छल्लेदार सब्जियां काट कर रखी हैं। छोटे छोटे प्यालों में जायफल, दालचीनी, इलाइची, जाफरानी केसर, चक्र फूल और न जाने कौन – कौन से अजूबे मोहक पदार्थ रखे हुए हैं। दूसरी तरफ चीनी मिटटी के सफ़ेद कटोरों में नमक, हल्दी, मिर्च, धनिया, हींग, अदरक और लहसुन भी आत्मसंतुष्टि से भरे हुए हैं। जैतून का तेल सुराही नुमा जग में बैठा बाकी सब को यूँ देख रहा है जैसी बाढ़ ग्रस्त इलाके को हेलीकाप्टर पर बैठा मंत्री। सारे बर्तन एकदम साफ़ सुथरे और चमकते हुए, जैसे १५ अगस्त की प्रभात फेरी के लिए तैयार स्कूल के बच्चे।

ऐसा लगता है जैसे बोरीवली में फिल्माए जा रहे एक सीन से कैमरा एक पल के लिए स्विट्ज़रलैंड की हसीन वादियों में पहुँच गया हो। सब कुछ इतना सरल, सहज, सुन्दर और सुगम। बस सब्जियां कटी हों, तेल गरम हो, मसाले पिसे हों – सब्जी डालो और पकाओ – न सब्जी काटने की समस्या, न बर्तन धोने का टेंशन! मन हुआ कि ऐसे ही किसी टीवी शो में भर्ती हुआ जाये, इसी बहाने रोज अच्छे पकवान खाने को मिलेंगे।

खैर लौट के बुद्धू घर को आये। समझ में आया कि यह अपने बस का रोग नहीं – जिस का काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे। उस दिन से आज तक अपनी पाक प्रतिभा मैगी बनाने तक ही सीमित है।

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